Saturday, April 6, 2019

प्रेम

Sacrifice is synonymous to love. The one who can sacrifice, can attain nector of love. Portraying same emotion in my words. Hope you like it

जीने को कठिन है,
नियामक संसार के,
पीड़ा में प्रेम की जो पाए सुख,
सर्वस्व वार के,
वही जीत पाए यहाँ ,
जो सब कुछ हार दे,
राम कहलाये महाभाग
सिया संग त्याग के
अस्तित्व की अपूर्णता में
रहे जो स्वयं पूर्ण,
ऐसे स्वछन्द प्रेम में,
जीवन गुजार दे ☺️

Friday, April 5, 2019

रात सरकती जाती है

जैसे जैसे रात सरकती जाती है
याद गहराती जाती है,
पीर गहरे ज़ख्मो की
बेख़ौफ़ कोहराम मचाती है,
मैं चाहती हूं कुछ पल का सुकून
पर
अंधेरे की आढ़ लेकर
कुछ परछाइयां मुझसे मिलने आती है,
मैं बचना चाहती हूं जिन सवालों से,
उन्हीं सवालों के कठघरे में,
बेबाक मुझे बिठाती है
फिर एक बार निशब्द सी,
स्तब्ध सी, चाद्दर में मुंह ढंककर,
आंखों के किवाड़ गिरा
नींद को अपने पास बुला
मैं ढूंढती हूँ कुछ पल का सुकून

मिट्टी

मैं मिट्टी हूँ,
बिखरुं तो अस्तित्वविहीन,
संवरु तो अनन्त तक विस्तार मेरा
बीजों को खुद में सहेज,
मैं नवजीवन संचार करूँ,
कुम्हार के हाथ से पडूँ,
मैं कितने ही रूप धारण करूँ,
देहाभिमान जो तुम खुद पे करो
जात पात पे जो मर मिटो,
तो याद तुम्हें मैं दिलाती हूँ,
सिमटने मेरे आँचल में,
अंत में सभी आएंगे।
मैं मिट्टी हूँ, सब मुझमें है
मैं सबमें हूँ

Thursday, April 4, 2019

मृत्यु

जीवन में कुछ लोग हमें सहारा देते है और कुछ को हमारा सहारा होता है। कोशिश यही होनी चाहिए जो हमारे सहारे बने है उनको कभी भावनात्मक रूप से टूटने पर विवश ना किया जाए।

यह कविता उन चंद अपनों के नाम जिनको कभी अपना माना था, मगर उनके लिए मौकापरस्त होना ही जीवन चलाने का मंत्र था।

मत आना तुम दोहराने
वही गीत अपने पुराने
जब राख का मैं ढेर बनूँ
जब अंतिम विदा इस जग से लूं

तुम्हारे खोखले शब्द
करते है मुझे निशब्द
उन शब्दों से अंतिम बार
वेधने मुझे तुम आना

दुनिया क्या कहेगी,
इस प्रश्न को मिटा दिया है
मैंने अपनी कहानी से,
दुनिया का गणित बिठाने को
तुम मुझे भाज्य ना कर जाना

जिस तरह छला है हर बार
कभी उपहास कभी तिरस्कार
वही लीक कायम रखना इस बार
दो आंसू झूठे देकर मुझको,
अब ऋणि मत कर जाना

अंतिम क्षणों की पीड़ा सा अनुभव,
जीते जी भरपूर मिला है,
जब जान से प्यारों ने,
कुछ सक्षम सहारों ने,
निर्ममता से भरपूर छला है

मोहभंग हो जब जीवन से,
मृत्यु क्या दुखदायी होगी
इस वेदना का अंत करने में
एक वही सखी सहायी होगी

Thursday, March 7, 2019

अभिमन्यु

कितने अभिमन्यु कितनी बार,
प्रचंड करेंगे समर अगन,
कितने वीर आहुत करेंगे
निज प्राणों की समिधा दहन

जो जीयेंगे युद्घ में,
वही शौर्य गाथा गाएंगे,
उत्तरा के निर्जल नयन में,
क्या स्वप्न फिर खिल पाएंगे

कितने शीश और चढ़ेंगे
रणचंडी को समरांगण में,
निर्मम काल व्यूह में पड़कर,
कितने शूर वीरगति पाएंगे

शत्रु के भीरु उन्माद से आहत,
क्या राष्ट्रध्वज को कफ़न बनाएंगे
संवेन्दना का आडम्बर करते हुए
हम कितने नीर बहाएंगे

कितनी बार पार्थ के शर,
मूक विवश रह जाएंगे,
कितनी बार अरि गांडीव से,
जीवन अभय को पाएंगे

अति नृशंस संहार के समक्ष,
क्या माधव भी चुपचाप रहेंगे,
रक्तरंजित शावक के शव को,
निर्मम नियति का फेर कहेंगे

निज जीवन को तृण सम कर,
खड़ी राष्ट्रसेवा में तत्त्पर,
ऐसी दृढ़निष्ट संतति का,
क्या हम तर्पण कर पाएंगे

Sunday, March 3, 2019

ज़िन्दगी लम्हों में जी जाती है

ज़िन्दगी तो लम्हों में जी जाती है,
दिन, महीने, सालों के पैमानों में उम्रें नपती है

प्रेम के सतत प्रदर्शन में नहीं,
ज़िन्दगी साथ देने से साथ चलती है,

चमकती शौहरत की बुलंदियों पर नहीं ठहरती,
थके कदम घर की देहली पर थमती है

ज़माने में प्रशंसा गीत भी लगते है नीरस
दोस्त की गाली जब मिस्री की तरह घुलती है

महंगे तौफों में चमक में नहीं,
वक़्त पर साथ देने वालों के साथ ढलती है,

ऊंचे महलों की जगमगाहट में धुंधली होती,
वाजिब साथ पा कर चल निकलती है,

ज़िन्दगी सीधे सपाट रास्तों में नहीं,
टेढ़ी मेढ़ी गलियों से गुजरती है

ज़िन्दगी बस इन्ही छोटे लम्हों में मिलती है

Sunday, February 24, 2019

अहिल्या

मैं पाषाण हूँ,
या पाषाण मानवता का प्रतिबिंब,
जुड़े थे जिससे सहज भाव,
जिसकी थी मैं अनुरक्ता,
एक निर्दोष अपराध ने,
बनाया उसने ही त्यक्ता,
समझा गया मुझे ना सहचरी ना अनुचरी,
मैं अहिल्या हूँ,

कहते है मैं श्रेष्ठ पतिव्रत का उदाहरण हूँ,
पंचकन्या में स्थान है मेरा,
विरंचि की आत्मजा भी है सम्मान मेरा,
श्रेष्ठ होने के लिए युगोंयुग पाषाण बनी हूँ,
धूप, पानी, पतझड़ सहे है,सभी समता से,
सम्मान के आभाव में,
अपमान को आत्मसाध किया है

अक्षम्य अपराध तो मेरे साथ हुआ,
फिर भी अपराधी बनी हूँ मैं,
छला गया है मुझे उपभोग की वस्तु बना,
शील भंग ने हरा मेरी गरिमा को,
स्वाभिमान पर प्रहार से विक्षत अस्तित्व हूँ मैं,
काम क्रोध के झांजावात में
करुणा का स्पर्श ना पा पथरा गयी हूँ मैं,

कहते है जब आएंगे राम,
तो लौट आएंगे मुझमें प्राण,
चरणरज से उनकी हो जाऊंगी निष्कलंका,
चेतनता का स्पंदन भूल जड़ हो जीना,
कलंक जो है मेरे जीवन पर,
सभ्यता के बोझ से मलीन हूँ मैं,
अन्यथा सर्वदा ही कुलीन हूँ मैं

Wednesday, December 12, 2018

यायावरी

मैं तटस्थ भाव से
देखती हूँ परिवर्तन
हिमीगिरि के शिखर पर
पिघलते तुहिन कण
जीवन की यायावरी में

बातों के बदलते मतलब
समझ से परे बेमतलब
शब्दों की बाजीगरी में
इस नीरव सी यायावरी में

स्वयं की निजता विसार
सारी प्रभुता के पार
फैला हुआ द्वन्द अपार
दिग्भ्रमित करती यायावरी में

कोलाहल मन का है
या कोतुहल क्षण भर का
सिमित दायरों में उलझे उत्तर
इस अनंत यायावरी में

कंक्रीट की बस्तियों में
ढूंढ़ते प्रकृति की गरिमा को
दिखते है कुछ सभ्य लोग
सिमटती हुई यायावरी में 

Thursday, September 13, 2018

तुमसे ही

जो तुमसे हुआ
वो मुकम्मल था
इसलिए दुबारा
दोहराया ना जा सका

अधूरे किरदार
पूरी कहानी कह गए
फिर क्या थी शिकायत
के अधूरे रह गए

बेसब्र घिरती घटाएं
बेहिसाब बरस गई
किसी ने क्या देखा
कहाँ बहा ले गयी

अजनबी शहरों में
दो हमसफर
भटके हुए मुसाफिर
मंज़िल तलाशती नज़र

Tuesday, June 19, 2018

मौन

शब्दों के आघात से उपजी पीड़ा,
चाहे कितनी हृदयविदारक हो,
उस पीड़ा समतुल्य नहीं फिर भी,
अनंत मौन जिसका कारक हो,

कहानियां आज भी जीवंत है उन सभाओं की,
लुटती लाज कुलवधु की, टूटती परम्पराओं की,
गलत वह नहीं जो कुकर्मी थे, विधर्मी थे,
गलत वह थे जो मर्यादा की ढ़ाल ले छिपते रहे

गलत नहीं थे राम जब तजी जानकी,
गलत थे वह लोग जो जड़वत रहे,
कह देते कि हे राम यह अन्याय है,
जिस तरह आक्षेप सती पर था किया

दीर्घकाल से कई सभ्यताओं को लीलता हुआ,
जब प्रयत्क्ष था सब कुछ, फिर भी चुपचाप रहा,
विकटतम चिरनिद्रा में जो हैं पड़े,
ऐसे सभ्य साधुजनों के संग कोई कैसे रहे

लुटता रहा कई बार आर्यावर्त,
कभी तुर्क, कभी मंगोल या मुग़ल,
कमज़ोर नहीं था बाजुओं में बाहुबल,
शिथिल पड़ा था कहने भर का संकल्प

थोड़े प्रयास में जग जाते है जो निद्रा में रहे,
उन्हें कैसे कोई जगाये जो निद्रा का आडम्बर रचे,
कुछ कहने से बात बढ़ेगी,
इस बात से डरकर कुछ ना कहे

स्पंदन संवेदना निशानी है जीवन की,
निष्ठुर बन नियति की आढ़ ले,
ज्ञान की पोथियाँ जो है बांचते,
जीये जाते मृतकों सा जीवन