मैं मिट्टी हूँ,
बिखरुं तो अस्तित्वविहीन,
संवरु तो अनन्त तक विस्तार मेरा
बीजों को खुद में सहेज,
मैं नवजीवन संचार करूँ,
कुम्हार के हाथ से पडूँ,
मैं कितने ही रूप धारण करूँ,
देहाभिमान जो तुम खुद पे करो
जात पात पे जो मर मिटो,
तो याद तुम्हें मैं दिलाती हूँ,
सिमटने मेरे आँचल में,
अंत में सभी आएंगे।
मैं मिट्टी हूँ, सब मुझमें है
मैं सबमें हूँ
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