Friday, April 5, 2019

रात सरकती जाती है

जैसे जैसे रात सरकती जाती है
याद गहराती जाती है,
पीर गहरे ज़ख्मो की
बेख़ौफ़ कोहराम मचाती है,
मैं चाहती हूं कुछ पल का सुकून
पर
अंधेरे की आढ़ लेकर
कुछ परछाइयां मुझसे मिलने आती है,
मैं बचना चाहती हूं जिन सवालों से,
उन्हीं सवालों के कठघरे में,
बेबाक मुझे बिठाती है
फिर एक बार निशब्द सी,
स्तब्ध सी, चाद्दर में मुंह ढंककर,
आंखों के किवाड़ गिरा
नींद को अपने पास बुला
मैं ढूंढती हूँ कुछ पल का सुकून

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