ज़िन्दगी तो लम्हों में जी जाती है,
दिन, महीने, सालों के पैमानों में उम्रें नपती है
प्रेम के सतत प्रदर्शन में नहीं,
ज़िन्दगी साथ देने से साथ चलती है,
चमकती शौहरत की बुलंदियों पर नहीं ठहरती,
थके कदम घर की देहली पर थमती है
ज़माने में प्रशंसा गीत भी लगते है नीरस
दोस्त की गाली जब मिस्री की तरह घुलती है
महंगे तौफों में चमक में नहीं,
वक़्त पर साथ देने वालों के साथ ढलती है,
ऊंचे महलों की जगमगाहट में धुंधली होती,
वाजिब साथ पा कर चल निकलती है,
ज़िन्दगी सीधे सपाट रास्तों में नहीं,
टेढ़ी मेढ़ी गलियों से गुजरती है
ज़िन्दगी बस इन्ही छोटे लम्हों में मिलती है
बेहतरीन पंक्तियाँ
ReplyDeleteशुक्रिया
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