Wednesday, July 12, 2017

फिर कहाँ मिलेंगे



टूटे जो शाख से पत्ते वो फिर कहाँ मिलेंगे
भटकेंगे गली गली और ख़ाक में मिलेंगे
नयी बहारें नया सावन नयी हरियाली छायेगी
बीती बहारें, बीती बातें, सब भूली बिसरी हो जाएँगी
नामालूम था के चंद क़दमों में ही राहें बदलेंगे
तय तो किया था कि उम्र भर साथ चलेंगे
हंसी में समेट कर सारे दर्द तन्हा रहा करेंगे
धड़कनों में रहने के मौके फिरसे कहाँ मिलेंगे
चाहतों के परिंदों को अक्सर घरोंदे नहीँ मिलते
बेपनाह मोहब्बत को ही समाजों में हक़ नही मिलते
जब माली ही ना सींच सके अपने लगाये उपवन को
जब ममता ही ना समझ सके प्रेम के बंधन को
निष्ठुरता के सामने निश्छल सपने कहाँ सजेंगे  
गुज़रते समय में  प्रीत  के वह पल वापिस कहाँ मिलेंगे

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